दुख सुख पाप पुन्य दिन राती
दुख सुख पाप पुन्य दिन राती
चौपाई ३-५, दोहा ६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती॥ दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू॥ माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा॥ कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा॥ सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा॥ ३-५ ॥
अर्थ
दुःख-सुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, साधु-असाधु, सुजाति-कुजाति, दानव-देव, ऊँच-नीच, अमृत, सुजीवन, विष, मृत्यु, माया-ब्रह्म, जीव-जगदीश, लक्ष्मी-अलक्ष्मी, रंक-अवनीश, काशी-मगध-गंगाजी-कर्मनाशा, मरु-मारवाड़-महिदेव-गवासा, स्वर्ग-नरक, अनुराग-वैराग्य, और निगम-आगम के गुण-दोष-विभाग—ये सब ब्रह्मा की सृष्टि में हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “संत असंत वन्दना” प्रकरण का चौपाई ३-५, दोहा ६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में संत और असंत के स्वभाव तथा गुण-दोष के भेद का सूक्ष्म विवेचन का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
संत असंत वन्दना