किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू

चौपाई ४, दोहा ७ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥ हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू॥ ४ ॥

अर्थ

बुरा वेष बना लेने पर भी साधु का सम्मान ही होता है, जैसे जगत् में जाम्बवान् और हनुमानजी का हुआ। बुरे संग से हानि और अच्छे संग से लाभ होता है, यह बात लोक और वेद में है और सभी लोग इसको जानते हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “संत असंत वन्दना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में संत और असंत के स्वभाव तथा गुण-दोष के भेद का सूक्ष्म विवेचन का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
संत असंत वन्दना