सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं
चौपाई २, दोहा ७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं॥ खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥ २ ॥
अर्थ
भगवान् के भक्त जैसे उस चूक को सुधार लेते हैं और दुःख-दोषों को मिटाकर निर्मल यश देते हैं, वैसे ही दुष्ट भी कभी-कभी उत्तम संग पाकर भलाई करते हैं; परन्तु उनका कभी भंग न होनेवाला मलिन स्वभाव नहीं मिटता।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “संत असंत वन्दना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में संत और असंत के स्वभाव तथा गुण-दोष के भेद का सूक्ष्म विवेचन का वर्णन है।
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संत असंत वन्दना