जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह
दोहा ६ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार। संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥ ६ ॥
अर्थ
विधाता ने इस जड़-चेतन विश्व को गुण-दोषमय रचा है; किन्तु संतरूपी हंस दोषरूपी जल को छोड़कर गुणरूपी दूध को ही ग्रहण करते हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “संत असंत वन्दना” प्रकरण का दोहा ६ है। इस प्रकरण में संत और असंत के स्वभाव तथा गुण-दोष के भेद का सूक्ष्म विवेचन का वर्णन है।
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संत असंत वन्दना