बार बार बिनवउँ मुनि तोही
बार बार बिनवउँ मुनि तोही
चौपाई ४, दोहा १२७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
बार बार बिनवउँ मुनि तोही। जिमि यह कथा सुनायहु मोही॥ तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएहु तबहूँ॥ ४ ॥
अर्थ
हे मुनि! मैं तुमसे बार-बार विनती करता हूँ कि जिस तरह यह कथा तुमने मुझे सुनायी है, उस तरह भगवान् श्रीहरि को कभी मत सुनाना। चर्चा भी चले तब भी इसको छिपा जाना।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “नारद का अभिमान और माया” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १२७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का कामजय के बाद अभिमान और भगवान की माया का प्रभाव का वर्णन है।
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नारद का अभिमान और माया