सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं

चौपाई ५, दोहा ११८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं। मसक कहूँ खगपति हित करहीं॥ देखि राम रुख बानर रीछा। प्रेम मगन नहिं गृह कै ईछा॥ ५ ॥

अर्थ

प्रभु के (ऐसे) वचन सुनकर हम लाज के मारे मरे जा रहे हैं। कहीं मच्छर भी गरुड़ का हित कर सकते हैं? श्रीरामजी का रुख देखकर रीछ-वानर प्रेम में मग्र हो गये। उनकी घर जाने की इच्छा नहीं है।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “विभीषण का वस्त्राभूषण बरसाना” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ११८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण द्वारा वानरों और भालुओं पर वस्त्र-आभूषण बरसाने और उनके हर्षपूर्वक धारण करने का वर्णन है।

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विभीषण का वस्त्राभूषण बरसाना