चितइ सबन्हि पर कीन्ही दाया
चितइ सबन्हि पर कीन्ही दाया
चौपाई २, दोहा ११८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
चितइ सबन्हि पर कीन्ही दाया। बोले मृदुल बचन रघुराया॥ तुम्हरें बल मैं रावनु मार्यो। तिलक बिभीषन कहँ पुनि सार्यो॥ २ ॥
अर्थ
श्रीरघुनाथजी ने कृपादृष्टि से देखकर सब पर दया की। फिर वे कोमल वचन बोले--हे भाइयो! तुम्हारे ही बल से मैंने रावण को मारा और फिर विभीषण का राजतिलक किया।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “विभीषण का वस्त्राभूषण बरसाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण द्वारा वानरों और भालुओं पर वस्त्र-आभूषण बरसाने और उनके हर्षपूर्वक धारण करने का वर्णन है।
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विभीषण का वस्त्राभूषण बरसाना