कहि न सकहिं कछु प्रेम बस

दोहा ११८ (ग) · लंकाकाण्ड

दोहा पाठ

कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि। सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि॥ ११८ (ग) ॥

अर्थ

वे कुछ कह नहीं सकते; प्रेमवश नेत्रों में जल भर-भरकर, नेत्रों का पलक मारना छोड़कर (टकटकी लगाये) सम्मुख होकर श्रीरामजी की ओर देख रहे हैं।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “विभीषण का वस्त्राभूषण बरसाना” प्रकरण का दोहा ११८ (ग) है। इस प्रकरण में विभीषण द्वारा वानरों और भालुओं पर वस्त्र-आभूषण बरसाने और उनके हर्षपूर्वक धारण करने का वर्णन है।

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विभीषण का वस्त्राभूषण बरसाना