जोइ जोइ मन भावइ सोइ लेहीं

चौपाई ४, दोहा ११७ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

जोइ जोइ मन भावइ सोइ लेहीं। मनि मुख मेलि डारि कपि देहीं॥ हँसे रामु श्री अनुज समेता। परम कौतुकी कृपा निकेता॥ ४ ॥

अर्थ

जिसके मन को जो अच्छा लगता है, वह वही ले लेता है। मणियों को मुँह में लेकर वानर फिर उन्हें उगल देते हैं। यह तमाशा देखकर परम विनोदी और कृपा के धाम श्रीरामजी लक्ष्मणजी सहित हँसने लगे।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “विभीषण का वस्त्राभूषण बरसाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ११७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण द्वारा वानरों और भालुओं पर वस्त्र-आभूषण बरसाने और उनके हर्षपूर्वक धारण करने का वर्णन है।

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विभीषण का वस्त्राभूषण बरसाना