बरषा गत निर्मल रितु आई

चौपाई १, दोहा १८ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई॥ एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालहु जीति निमिष महुँ आनौं॥ १ ॥

अर्थ

वर्षा बीत गयी, निर्मल शरद ऋतु आ गयी। परन्तु हे तात! सीता की कोई खबर नहीं मिली। एक बार कैसे भी पता पाऊँ तो काल को भी जीतकर पल भर में जानकी को ले आऊँ।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “सुग्रीव पर राम की नाराजी, लक्ष्मण का कोप” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वर्षा बाद सुग्रीव की उदासीनता पर राम का असंतोष और लक्ष्मण का कोपसहित किष्किंधा-प्रस्थान का वर्णन है।

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सुग्रीव पर राम की नाराजी, लक्ष्मण का कोप