जेहिं सायक मारा मैं बाली

चौपाई ३, दोहा १८ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली॥ जासु कृपाँ छूटहिं मद मोहा। ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा॥ ३ ॥

अर्थ

जिस बाण से मैंने बाली को मारा था, उसी बाण से कल उस मूढ़ को मारूँ! [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! जिनकी कृपा से मद और मोह छूट जाते हैं, उनको कहीं स्वप्न में भी क्रोध हो सकता है? [यह तो लीलामात्र है।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “सुग्रीव पर राम की नाराजी, लक्ष्मण का कोप” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वर्षा बाद सुग्रीव की उदासीनता पर राम का असंतोष और लक्ष्मण का कोपसहित किष्किंधा-प्रस्थान का वर्णन है।

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सुग्रीव पर राम की नाराजी, लक्ष्मण का कोप