इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा

चौपाई १, दोहा १९ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा॥ निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा॥ १ ॥

अर्थ

यहाँ (किष्किन्धा नगरी में) पवनकुमार श्रीहनुमानजी ने विचार किया कि सुग्रीव ने श्रीरामजी के कार्य को भुला दिया। उन्होंने सुग्रीव के पास जाकर चरणों में सिर नवाया। [साम, दान, दण्ड, भेद] चारों प्रकार की नीति कहकर उन्हें समझाया।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “सुग्रीव पर राम की नाराजी, लक्ष्मण का कोप” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वर्षा बाद सुग्रीव की उदासीनता पर राम का असंतोष और लक्ष्मण का कोपसहित किष्किंधा-प्रस्थान का वर्णन है।

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सुग्रीव पर राम की नाराजी, लक्ष्मण का कोप