कतहुँ रहउ जौं जीवति होई
कतहुँ रहउ जौं जीवति होई
चौपाई २, दोहा १८ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
कतहुँ रहउ जौं जीवति होई। तात जतन करि आनउँ सोई॥ सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी॥ २ ॥
अर्थ
कहीं भी रहे, यदि जीवित होगी तो हे तात! प्रयत्न करके मैं उसे अवश्य लाऊँगा। राज्य, कोष, पुर और नारी पा गया, इसलिये सुग्रीव ने भी मेरी सुधि भुला दी।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “सुग्रीव पर राम की नाराजी, लक्ष्मण का कोप” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वर्षा बाद सुग्रीव की उदासीनता पर राम का असंतोष और लक्ष्मण का कोपसहित किष्किंधा-प्रस्थान का वर्णन है।
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सुग्रीव पर राम की नाराजी, लक्ष्मण का कोप