बालि-सुग्रीव युद्ध, बालि उद्धार

बालि और सुग्रीव के बीच भीषण युद्ध होता है, जिसमें अंततः श्रीरामजी बाण चलाकर बालि का वध करते हैं। मृत्यु के क्षण में बालि को प्रभु का ज्ञान प्राप्त होता है और वह उनकी कृपा से परम गति पाता है।

किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण ५ / १४

प्रकरण पाठ

चौपाई

अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी॥ भिरे उभौ बाली अति तर्जा। मुठिका मारि महाधुनि गर्जा॥ १ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर वह महान् अभिमानी बालि सुग्रीव को तिनके के समान जानकर चला। दोनों भिड़ गये। बालि ने सुग्रीव को बहुत धमकाया और घूँसा मारकर बड़े जोर से गरजा।

चौपाई

तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा॥ मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला॥ २ ॥

अर्थ:

तब सुग्रीव व्याकुल होकर भागा। घूँसे की चोट उसे वज्र के समान लगी। [सुग्रीव ने आकर कहा—] हे कृपालु रघुवीर! मैंने आपसे पहले ही कहा था कि बालि मेरा भाई नहीं, यह काल है।

चौपाई

एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ॥ कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा॥ ३ ॥

अर्थ:

[श्रीरामजी ने कहा—] तुम दोनों भाइयों का एक-सा ही रूप है। इसी भ्रम से मैंने उसको नहीं मारा। फिर श्रीरामजी ने सुग्रीव के शरीर को हाथ से स्पर्श किया, जिससे उसका शरीर वज्र के समान हो गया और सारी पीड़ा जाती रही।

चौपाई

मेली कंठ सुमन कै माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला॥ पुनि नाना बिधि भई लराई। बिटप ओट देखहिं रघुराई॥ ४ ॥

अर्थ:

तब श्रीरामजी ने सुग्रीव के गले में फूलों की माला डाल दी और फिर उसे बड़ा भारी बल देकर भेजा। दोनों में पुनः अनेक प्रकार से युद्ध हुआ। श्रीरघुनाथजी वृक्ष की आड़ से देख रहे थे।

दोहा

बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि। मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि॥ ८ ॥

अर्थ:

सुग्रीव ने बहुत-से छल-बल किये, किन्तु [अन्त में] भय मानकर हृदय से हार गया। तब श्रीरामजी ने तानकर बालि के हृदय में बाण मारा।

दोहा 9 के अंतर्गत
चौपाई

परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें॥ स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ॥ १ ॥

अर्थ:

बाण के लगते ही बालि व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। फिर उठकर बैठ गया, और प्रभु को आगे देखकर। भगवान् का श्याम शरीर है, सिर पर जटा बनाए हैं, लाल नेत्र हैं, बाण लिये हैं और धनुष चढ़ाए हैं।

चौपाई

पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा॥ हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा॥ २ ॥

अर्थ:

बालि ने बार-बार भगवान की ओर देखकर चित्त को उनके चरणों में लगा दिया। प्रभु को पहचानकर उसने अपना जन्म सफल माना। उसके हृदय में प्रीति थी, पर मुख में कठोर वचन थे। वह श्रीरामजी की ओर देखकर बोला--।

चौपाई

धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं। मारेहु मोहि ब्याध की नाईं॥ मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहि मारा॥ ३ ॥

अर्थ:

हे गोसाईं! आपने धर्म की रक्षा के लिये अवतार लिया है और मुझे व्याध की तरह (छिपकर) मारा? मैं वैरी और सुग्रीव प्यारा? हे नाथ! किस दोष से आपने मुझे मारा ?।

चौपाई

अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥ इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥ ४ ॥

अर्थ:

हे मूर्ख! सुन, छोटे भाई की स्त्री, बहिन, पुत्र की स्त्री और कन्या-ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता।

चौपाई

मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना॥ मम भुज बल आश्रित तेहि जानी। मारा चहसि अधम अभिमानी॥ ५ ॥

अर्थ:

हे मूढ़! तुझे अत्यन्त अभिमान है। तूने अपनी स्त्री की सीख पर भी कान (ध्यान) नहीं दिया। सुग्रीव को मेरी भुजाओं के बल का आश्रित जानकर भी अरे अधम अभिमानी! तूने उसको मारना चाहा।

दोहा

सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि। प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि॥ ९ ॥

अर्थ:

बालि ने कहा--हे श्रीरामजी! सुनिये, स्वामी (आप) से मेरी चतुराई नहीं चल सकती। हे प्रभो! अन्तकाल में आपकी गति (शरण) पाकर मैं अब भी पापी ही रहा ?।

दोहा 10 के अंतर्गत
चौपाई

सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी॥ अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना॥ १ ॥

अर्थ:

बालि की अत्यन्त कोमल वाणी सुनकर श्रीरामजी ने उसके सिर को अपने हाथ से स्पर्श किया [और कहा--] मैं तुम्हारे शरीर को अचल कर दूँ, तुम प्राणों को रखो। बालि ने कहा--हे कृपानिधान! सुनिये--।

चौपाई

जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥ जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अबिनासी॥ २ ॥

अर्थ:

मुनिगण जन्म-जन्म में (प्रत्येक जन्म में) [अनेकों प्रकार का] साधन करते रहते हैं। फिर भी अन्तकाल में उन्हें 'राम' नहीं कह आता (उनके मुख से रामनाम नहीं निकलता)। जिनके नाम के बल से शंकरजी काशी में सबको समान रूप से अविनाशिनी गति (मुक्ति) देते हैं।

चौपाई

मम लोचन गोचर सोइ आवा। बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा॥ ३ ॥

अर्थ:

वह श्रीरामजी स्वयं मेरे नेत्रों के सामने आ गये हैं। हे प्रभो! ऐसा संयोग क्या फिर कभी बन पड़ेगा ?।

छन्द

सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं। जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं॥ मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही। अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही॥ १ ॥

अर्थ:

श्रुतियाँ 'नेति-नेति' कहकर निरन्तर जिनका गुणगान करती रहती हैं, तथा प्राण और मन को जीतकर एवं इन्द्रियों को [विषयों के रस से सर्वथा] नीरस बनाकर मुनिगण ध्यान में जिनकी कभी-कभी ही झलक पाते हैं, वे ही प्रभु (आप) साक्षात् मेरे सामने प्रकट हैं। आपने मुझे अत्यन्त अभिमानवश जानकर यह कहा कि तुम शरीर रख लो। परन्तु ऐसा मूर्ख कौन होगा जो हठपूर्वक कल्पवृक्ष को काटकर उससे बबूल के बाड़ लगाएगा (अर्थात् पूर्णकाम बना देने वाले आपको छोड़कर आपसे इस नश्वर शरीर की रक्षा चाहेगा)?।

छन्द

अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ। जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥ यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ। गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिऐ॥ २ ॥

अर्थ:

हे नाथ! अब मुझपर दयादृष्टि कीजिये और मैं जो वर माँगता हूँ उसे दीजिये। मैं कर्मवश जिस योनि में जन्म लूँ, वहीं श्रीरामजी के चरणों में प्रेम करूँ! हे कल्याणप्रद प्रभो! यह मेरा पुत्र अंगद विनय और बल में मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीजिये। और हे देवता और मनुष्यों के नाथ! बाँह पकड़कर इसे अपना दास बनाइये।

दोहा

राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग। सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग॥ १० ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के चरणों में दृढ़ प्रीति करके बालि ने शरीर को वैसे ही त्याग दिया जैसे हाथी अपने गले से फूलों की माला का गिरना न जाने।