बालि-सुग्रीव युद्ध, बालि उद्धार
बालि और सुग्रीव के बीच भीषण युद्ध होता है, जिसमें अंततः श्रीरामजी बाण चलाकर बालि का वध करते हैं। मृत्यु के क्षण में बालि को प्रभु का ज्ञान प्राप्त होता है और वह उनकी कृपा से परम गति पाता है।
किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण ५ / १४
प्रकरण पाठ
एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ॥ कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा॥ ३ ॥
अर्थ:
[श्रीरामजी ने कहा—] तुम दोनों भाइयों का एक-सा ही रूप है। इसी भ्रम से मैंने उसको नहीं मारा। फिर श्रीरामजी ने सुग्रीव के शरीर को हाथ से स्पर्श किया, जिससे उसका शरीर वज्र के समान हो गया और सारी पीड़ा जाती रही।
परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें॥ स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ॥ १ ॥
अर्थ:
बाण के लगते ही बालि व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। फिर उठकर बैठ गया, और प्रभु को आगे देखकर। भगवान् का श्याम शरीर है, सिर पर जटा बनाए हैं, लाल नेत्र हैं, बाण लिये हैं और धनुष चढ़ाए हैं।
पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा॥ हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा॥ २ ॥
अर्थ:
बालि ने बार-बार भगवान की ओर देखकर चित्त को उनके चरणों में लगा दिया। प्रभु को पहचानकर उसने अपना जन्म सफल माना। उसके हृदय में प्रीति थी, पर मुख में कठोर वचन थे। वह श्रीरामजी की ओर देखकर बोला--।
जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥ जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अबिनासी॥ २ ॥
अर्थ:
मुनिगण जन्म-जन्म में (प्रत्येक जन्म में) [अनेकों प्रकार का] साधन करते रहते हैं। फिर भी अन्तकाल में उन्हें 'राम' नहीं कह आता (उनके मुख से रामनाम नहीं निकलता)। जिनके नाम के बल से शंकरजी काशी में सबको समान रूप से अविनाशिनी गति (मुक्ति) देते हैं।
सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं। जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं॥ मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही। अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही॥ १ ॥
अर्थ:
श्रुतियाँ 'नेति-नेति' कहकर निरन्तर जिनका गुणगान करती रहती हैं, तथा प्राण और मन को जीतकर एवं इन्द्रियों को [विषयों के रस से सर्वथा] नीरस बनाकर मुनिगण ध्यान में जिनकी कभी-कभी ही झलक पाते हैं, वे ही प्रभु (आप) साक्षात् मेरे सामने प्रकट हैं। आपने मुझे अत्यन्त अभिमानवश जानकर यह कहा कि तुम शरीर रख लो। परन्तु ऐसा मूर्ख कौन होगा जो हठपूर्वक कल्पवृक्ष को काटकर उससे बबूल के बाड़ लगाएगा (अर्थात् पूर्णकाम बना देने वाले आपको छोड़कर आपसे इस नश्वर शरीर की रक्षा चाहेगा)?।
अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ। जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥ यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ। गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिऐ॥ २ ॥
अर्थ:
हे नाथ! अब मुझपर दयादृष्टि कीजिये और मैं जो वर माँगता हूँ उसे दीजिये। मैं कर्मवश जिस योनि में जन्म लूँ, वहीं श्रीरामजी के चरणों में प्रेम करूँ! हे कल्याणप्रद प्रभो! यह मेरा पुत्र अंगद विनय और बल में मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीजिये। और हे देवता और मनुष्यों के नाथ! बाँह पकड़कर इसे अपना दास बनाइये।