सुग्रीव का वैराग्य
प्रभु की करुणा और महिमा का अनुभव कर सुग्रीव के भीतर वैराग्य का भाव जाग उठता है। वह सांसारिक मोह की क्षणभंगुरता को समझकर प्रभु की शरण का महत्व पहचानता है।
किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण ४ / १४
प्रकरण पाठ
ए सब राम भगति के बाधक। कहहिं संत तव पद अवराधक॥ सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। मायाकृत परमारथ नाहीं॥ ९ ॥
अर्थ:
क्योंकि आपके चरणों की आराधना करनेवाले संत कहते हैं कि ये सब (सुख-सम्पत्ति आदि) रामभक्ति के विरोधी हैं। जगत् में जितने भी शत्रु, मित्र और सुख-दुःख [आदि द्वन्द्व] हैं, सब मायारचित हैं, परमार्थतः (वास्तव में) नहीं हैं।
बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा॥ सपनें जेहि सन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई॥ १० ॥
अर्थ:
हे श्रीरामजी! बालि तो मेरा परम हितकारी है, जिसकी कृपा से शोक का नाश करनेवाले आप मुझे मिले; और जिसके साथ अब स्वप्न में भी लड़ाई हो तो जागने पर उसे समझकर मन में संकोच होगा [कि स्वप्न में भी मैं उससे क्यों लड़ा]।
अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती। सब तजि भजनु करौं दिन राती॥ सुनि बिराग संजुत कपि बानी। बोले बिहँसि रामु धनुपानी॥ ११ ॥
अर्थ:
हे प्रभो! अब तो इस प्रकार कृपा कीजिए कि सब छोड़कर दिन-रात मैं आपका भजन ही करूँ। सुग्रीव की वैराग्ययुक्त वाणी सुनकर (उसके क्षणिक वैराग्य को देखकर) हाथ में धनुष धारण करनेवाले श्रीरामजी मुसकराकर बोले--।
जो कछु कहेहु सत्य सब सोई। सखा बचन मम मृषा न होई॥ नट मरकट इव सबहि नचावत। रामु खगेस बेद अस गावत॥ १२ ॥
अर्थ:
तुमने जो कुछ कहा है, वह सभी सत्य है; परन्तु हे सखा! मेरा वचन मिथ्या नहीं होता (अर्थात् बालि मारा जायगा और तुम्हें राज्य मिलेगा)। [काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि—] हे पक्षियों के राजा गरुड़! नट (मदारी) के बंदर की तरह श्रीरामजी सबको नचाते हैं, वेद ऐसा कहते हैं।