अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु
अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु
छन्द २, दोहा १० के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
छन्द पाठ
अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ। जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥ यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ। गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिऐ॥ २ ॥
अर्थ
हे नाथ! अब मुझपर दयादृष्टि कीजिये और मैं जो वर माँगता हूँ उसे दीजिये। मैं कर्मवश जिस योनि में जन्म लूँ, वहीं श्रीरामजी के चरणों में प्रेम करूँ! हे कल्याणप्रद प्रभो! यह मेरा पुत्र अंगद विनय और बल में मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीजिये। और हे देवता और मनुष्यों के नाथ! बाँह पकड़कर इसे अपना दास बनाइये।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “बालि-सुग्रीव युद्ध, बालि उद्धार” प्रकरण का छन्द २, दोहा १० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में बालि-सुग्रीव युद्ध, राम द्वारा बालि वध, और बालि को परम गति की प्राप्ति का वर्णन है।
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बालि-सुग्रीव युद्ध, बालि उद्धार