अब जनि कोउ माखै भट मानी
अब जनि कोउ माखै भट मानी
चौपाई २, दोहा २५२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
अब जनि कोउ माखै भट मानी। बीर बिहीन मही मैं जानी॥ तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू॥ २ ॥
अर्थ
अब कोई वीरता का अभिमानी नाराज़ न हो। मैंने जान लिया है कि पृथ्वी वीरों से खाली हो गई है। अब आशा छोड़कर अपने-अपने घर जाओ; विधि ने बैदेही के विवाह का लेख नहीं लिखा।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २५२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजाओं द्वारा शिवधनुष न उठा पाने पर जनक की निराशा और खिन्न वाणी का वर्णन है।
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राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशा