कहहु काहि यहु लाभु न भावा
कहहु काहि यहु लाभु न भावा
चौपाई १, दोहा २५२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
कहहु काहि यहु लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप चढ़ावा॥ रहउ चढ़ाउब तोरब भाई। तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई॥ १ ॥
अर्थ
कहिए, यह लाभ किसको अच्छा नहीं लगता। किसी ने भी शंकरजी का धनुष नहीं चढ़ाया। उसे चढ़ाना और तोड़ना तो दूर रहा; तिल भर भूमि भी कोई छुड़ा न सका।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २५२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजाओं द्वारा शिवधनुष न उठा पाने पर जनक की निराशा और खिन्न वाणी का वर्णन है।
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राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशा