श्रीहत भए हारि हियँ राजा

चौपाई ३, दोहा २५१ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

श्रीहत भए हारि हियँ राजा। बैठे निज निज जाइ समाजा॥ नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने। बोले बचन रोष जनु साने॥ ३ ॥

अर्थ

राजालोग हृदय से हारकर श्रीहीन हो गये और अपने-अपने समाज में जाकर बैठ गये। राजाओं को देखकर जनक अकुला उठे और ऐसे वचन बोले जो मानो क्रोध में सने हुए थे।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २५१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजाओं द्वारा शिवधनुष न उठा पाने पर जनक की निराशा और खिन्न वाणी का वर्णन है।

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राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशा