तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं

चौपाई ४, दोहा २५० के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं। उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं॥ जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं। चाप समीप महीप न जाहीं॥ ४ ॥

अर्थ

वे तमककर धनुष की ओर देखते हैं और फिर उसे पकड़ते हैं, करोड़ों प्रकार से बल लगाते हैं, पर वह उठता नहीं। जिन राजाओं के मन में कुछ विचार है, वे धनुष के पास ही नहीं जाते।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजाओं द्वारा शिवधनुष न उठा पाने पर जनक की निराशा और खिन्न वाणी का वर्णन है।

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राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशा