तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ
तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ
दोहा २५० · बालकाण्ड
दोहा पाठ
तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ। मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ॥ २५० ॥
अर्थ
वे मूढ़ राजा तमककर धनुष को पकड़ते हैं, परन्तु जब नहीं उठता तो लजाकर चले जाते हैं, मानो वीरों के बाहुबल को पाकर वह धनुष अधिक-अधिक गरुआता जाता हो।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशा” प्रकरण का दोहा २५० है। इस प्रकरण में राजाओं द्वारा शिवधनुष न उठा पाने पर जनक की निराशा और खिन्न वाणी का वर्णन है।
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राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशा