सब नृप भए जोगु उपहासी
सब नृप भए जोगु उपहासी
चौपाई २, दोहा २५१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सब नृप भए जोगु उपहासी। जैसें बिनु बिराग संन्यासी॥ कीरति बिजय बीरता भारी। चले चाप कर बरबस हारी॥ २ ॥
अर्थ
सब राजा उपहास के योग्य हो गये। जैसे वैराग्य के बिना संन्यासी उपहास के योग्य हो जाता है। कीर्ति, विजय, बड़ी वीरता—इन सबको वे धनुष के हाथों बरबस हारकर चले गये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २५१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजाओं द्वारा शिवधनुष न उठा पाने पर जनक की निराशा और खिन्न वाणी का वर्णन है।
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राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशा