सुकृतु जाइ जौं पनु परिहरऊँ
सुकृतु जाइ जौं पनु परिहरऊँ
चौपाई ३, दोहा २५२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सुकृतु जाइ जौं पनु परिहरऊँ। कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ॥ जौं जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई। तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई॥ ३ ॥
अर्थ
यदि प्रण छोड़ दूँ तो पुण्य चला जाएगा; इसलिए क्या करूँ, कन्या कुँआरी ही रहे। यदि मैं जानता कि पृथ्वी वीरों से शून्य है, तो प्रण करके उपहास का पात्र न बनता।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २५२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजाओं द्वारा शिवधनुष न उठा पाने पर जनक की निराशा और खिन्न वाणी का वर्णन है।
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राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशा