सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि
सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि
दोहा १८५ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर। अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर॥ १८५ ॥
अर्थ
सुनकर ब्रह्माजी के मन में हर्ष हुआ; उनका तन पुलकित हो गया और नेत्रों से नीर बहने लगा। तब वे धीरबुद्धि ब्रह्माजी सावधान होकर हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे--।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पृथ्वी और देवताओं की करुण पुकार” प्रकरण का दोहा १८५ है। इस प्रकरण में रावण के अत्याचार से पीड़ित पृथ्वी और देवताओं की भगवान से करुण प्रार्थना एवं ब्रह्मा की स्तुति का वर्णन है।
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पृथ्वी और देवताओं की करुण पुकार