अग जगमय सब रहित बिरागी

चौपाई ४, दोहा १८५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी॥ मोर बचन सब के मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना॥ ४ ॥

अर्थ

वे चराचरमय होते हुए भी सबसे रहित हैं और विरक्त हैं (उनकी कहीं आसक्ति नहीं है); वे प्रेम से प्रकट होते हैं, जैसे अग्नि। मेरी बात सब के मन को मान्य हुई। ब्रह्मा ने 'साधु, साधु!' कहकर बखान किया।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “पृथ्वी और देवताओं की करुण पुकार” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १८५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण के अत्याचार से पीड़ित पृथ्वी और देवताओं की भगवान से करुण प्रार्थना एवं ब्रह्मा की स्तुति का वर्णन है।

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पृथ्वी और देवताओं की करुण पुकार