सुर मुनि गंधर्बा मिलि करि सर्बा
छन्द, दोहा १८४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
सुर मुनि गंधर्बा मिलि करि सर्बा गे बिरंचि के लोका। सँग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका॥ ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई। जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई॥
अर्थ
तब देवता, मुनि और गन्धर्व सब मिलकर ब्रह्माजी के लोक (सत्यलोक) को गये। भय और शोक से अत्यन्त व्याकुल बेचारी पृथ्वी भी गौ का शरीर धारण किये हुए उनके साथ थी। ब्रह्माजी सब जान गये। उन्होंने मन में अनुमान किया कि इसमें मेरा कुछ भी वश नहीं चलने का। [तब उन्होंने पृथ्वी से कहा कि--] जिसकी तू दासी है, वही अविनाशी हमारा और तुम्हारा दोनों का सहायक है॥।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पृथ्वी और देवताओं की करुण पुकार” प्रकरण का छन्द, दोहा १८४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण के अत्याचार से पीड़ित पृथ्वी और देवताओं की भगवान से करुण प्रार्थना एवं ब्रह्मा की स्तुति का वर्णन है।