जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग
छन्द ३, दोहा १८६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा। सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा॥ जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा। मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुरजूथा॥ ३ ॥
अर्थ
जिन्होंने बिना किसी दूसरे संगी अथवा सहायक के अकेले ही तीन प्रकार की सृष्टि उत्पन्न की, वे पापों का नाश करनेवाले भगवान् हमारी सुधि लें। हम न भक्ति जानते हैं, न पूजा। जो संसार के (जन्म-मृत्यु के) भय का नाश करनेवाले, मुनियों के मन को आनन्द देनेवाले और विपत्तियों के समूह को नष्ट करनेवाले हैं। हम सब देवताओं के समूह मन, वचन और कर्म से चतुराई करने की बान छोड़कर उन (भगवान्) की शरण आए हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पृथ्वी और देवताओं की करुण पुकार” प्रकरण का छन्द ३, दोहा १८६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण के अत्याचार से पीड़ित पृथ्वी और देवताओं की भगवान से करुण प्रार्थना एवं ब्रह्मा की स्तुति का वर्णन है।