सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा

छन्द ४, दोहा १८६ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना। जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना॥ भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा। मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा॥ ४ ॥

अर्थ

सरस्वती, श्रुति, शेषजी और सम्पूर्ण ऋषि—कोई भी जिनको नहीं जानते, जिन्हें दीन प्रिय हैं, ऐसा वेद पुकारकर कहते हैं, वे ही श्रीभगवान् हम पर दया करें। हे संसाररूपी समुद्र के [मथने के] लिये मन्दराचलरूप, सब प्रकार से सुन्दर, गुणों के धाम और सुखों की राशि नाथ! आपके चरणकमलों में मुनि, सिद्ध और सारे देवता भय से अत्यन्त व्याकुल होकर नमस्कार करते हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “पृथ्वी और देवताओं की करुण पुकार” प्रकरण का छन्द ४, दोहा १८६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण के अत्याचार से पीड़ित पृथ्वी और देवताओं की भगवान से करुण प्रार्थना एवं ब्रह्मा की स्तुति का वर्णन है।

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पृथ्वी और देवताओं की करुण पुकार