जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती
चौपाई २, दोहा १८५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती॥ तेहिं समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ॥ २ ॥
अर्थ
जिसके हृदय में जैसी भक्ति और प्रीति होती है, प्रभु वहाँ (उसके लिए) सदा उसी रीति से प्रकट होते हैं। हे पार्वती! उस समाज में मैं भी था। अवसर पाकर मैंने एक बात कही--।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पृथ्वी और देवताओं की करुण पुकार” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १८५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण के अत्याचार से पीड़ित पृथ्वी और देवताओं की भगवान से करुण प्रार्थना एवं ब्रह्मा की स्तुति का वर्णन है।
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पृथ्वी और देवताओं की करुण पुकार