हरि ब्यापक सर्बत्र समाना

चौपाई ३, दोहा १८५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥ देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ

मैं तो यह जानता हूँ कि भगवान् सब जगह समान रूप से व्यापक हैं, प्रेम से वे प्रकट हो जाते हैं। देश, काल, दिशा, विदिशा में बताओ, ऐसी जगह कहाँ है जहाँ प्रभु न हों।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “पृथ्वी और देवताओं की करुण पुकार” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १८५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण के अत्याचार से पीड़ित पृथ्वी और देवताओं की भगवान से करुण प्रार्थना एवं ब्रह्मा की स्तुति का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
पृथ्वी और देवताओं की करुण पुकार