जय जय अबिनासी सब घट बासी

छन्द २, दोहा १८६ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा। अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा॥ जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा। निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानंदा॥ २ ॥

अर्थ

है अविनाशी, सब के हृदय में निवास करनेवाले (अन्तर्यामी), सर्वव्यापक परम आनन्दस्वरूप, अविगत, गोतीत, पवित्रचरित्र, मायारहित मुकुन्द! आपकी जय हो! जय हो!! [इस लोक और परलोक के सब भोगों से] विरक्त तथा मोह से सर्वथा छूटे हुए मुनिवृन्द भी अत्यन्त अनुरागी बनकर जिनका रात-दिन ध्यान करते हैं और जिनके गुणों के समूह का गान करते हैं, उन सच्चिदानन्द की जय हो।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “पृथ्वी और देवताओं की करुण पुकार” प्रकरण का छन्द २, दोहा १८६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण के अत्याचार से पीड़ित पृथ्वी और देवताओं की भगवान से करुण प्रार्थना एवं ब्रह्मा की स्तुति का वर्णन है।

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पृथ्वी और देवताओं की करुण पुकार