गुहँ सँवारि साँथरी डसाई
गुहँ सँवारि साँथरी डसाई
चौपाई ४, दोहा ८९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई॥ सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी॥ ४ ॥
अर्थ
गुह ने [इसी बीच] कुश और कोमल पत्तों की कोमल और सुन्दर साथरी सजाकर बिछा दी; और पवित्र, मीठे और कोमल देख-देखकर दोनों में भर-भरकर फल-मूल और पानी रख दिया [अथवा अपने हाथ से फल-मूल दोनों में भर-भरकर रख दिये]।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “शृंगवेरपुर में निषादराज द्वारा सेवा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ८९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शृंगवेरपुर में निषादराज गुह द्वारा श्रीराम की प्रेमपूर्ण सेवा और भक्तिपूर्ण स्वागत का वर्णन है।
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शृंगवेरपुर में निषादराज द्वारा सेवा