बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत
बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत
दोहा ८८ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु। ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु॥ ८८ ॥
अर्थ
[उनके आज्ञानुसार] मुझे चौदह वर्ष तक मुनियों का व्रत और वेष धारण कर और मुनियों के योग्य आहार करते हुए वन में ही बसना है, गाँव के भीतर निवास करना उचित नहीं है। यह सुनकर गुह को बड़ा दुःख हुआ।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “शृंगवेरपुर में निषादराज द्वारा सेवा” प्रकरण का दोहा ८८ है। इस प्रकरण में शृंगवेरपुर में निषादराज गुह द्वारा श्रीराम की प्रेमपूर्ण सेवा और भक्तिपूर्ण स्वागत का वर्णन है।
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शृंगवेरपुर में निषादराज द्वारा सेवा