धीरजु धरेउ कुअवसर जानी

चौपाई १, दोहा ७४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुहृद बोली मृदु बानी॥ तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही॥ १ ॥

अर्थ

परन्तु कुसमय जानकर धैर्य धारण किया और स्वभाव से ही हित चाहने वाली सुमित्राजी कोमल वाणी से बोलीं—हे तात! जानकीजी तुम्हारी माता हैं और सब प्रकार से स्नेह करने वाले श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे पिता हैं!

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ७४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण को सुमित्रा की राम-सीता सेवा हेतु प्रेरणा और आशीर्वाद का वर्णन है।

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श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद