तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू

चौपाई ४, दोहा ७५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू॥ जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू॥ ४ ॥

अर्थ

तुमको वन में सब प्रकार से आराम है, जिसके साथ श्रीरामजी और सीताजी रूप पिता-माता हैं। हे पुत्र! तुम वही करना जिससे श्रीरामचन्द्रजी वन में क्लेश न पावें, मेरा यही उपदेश है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ७५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण को सुमित्रा की राम-सीता सेवा हेतु प्रेरणा और आशीर्वाद का वर्णन है।

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श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद