तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं

चौपाई २, दोहा ७५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं॥ सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू॥ २ ॥

अर्थ

तुम्हारे ही भाग्य से श्रीरामजी वन को जा रहे हैं। हे तात! दूसरा कोई कारण नहीं है। सम्पूर्ण पुण्यों का सबसे बड़ा फल यही है कि श्रीसीतारामजी के चरणों में स्वाभाविक प्रेम हो।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण को सुमित्रा की राम-सीता सेवा हेतु प्रेरणा और आशीर्वाद का वर्णन है।

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श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद