मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत
मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत
सोरठा ७५ · अयोध्याकाण्ड
सोरठा पाठ
मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ। बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस॥ ७५ ॥
अर्थ
माता के चरणों में सिर नवाकर हृदय में डरते हुए [कि अब भी कोई विघ्न न आ जाए] लक्ष्मणजी तुरंत इस तरह चल दिए जैसे सौभाग्यवश कोई हिरन कठिन फंदे को तुड़ाकर भाग निकला हो।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद” प्रकरण का सोरठा ७५ है। इस प्रकरण में लक्ष्मण को सुमित्रा की राम-सीता सेवा हेतु प्रेरणा और आशीर्वाद का वर्णन है।
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श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद