उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम

छन्द, दोहा ७५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

छन्द पाठ

उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं। पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं॥ तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई। रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई॥

अर्थ

हे तात! मेरा यही उपदेश है (अर्थात् तुम वही करना) जिससे वन में तुम्हारे कारण श्रीरामजी और श्रीसीताजी सुख पावें और पिता, माता, प्रिय परिवार तथा नगर के सुखों की सुरति भूल जाएँ। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु को शिक्षा देकर आज्ञा दी और फिर यह आशीर्वाद दिया कि श्रीसीताजी और श्रीरघुवीरजी के चरणों में तुम्हारा निर्मल, अविरल और अमल प्रेम नित-नित नया हो!

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद” प्रकरण का छन्द, दोहा ७५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण को सुमित्रा की राम-सीता सेवा हेतु प्रेरणा और आशीर्वाद का वर्णन है।

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श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद