रागु रोषु इरिषा मदु मोहू
रागु रोषु इरिषा मदु मोहू
चौपाई ३, दोहा ७५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
रागु रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू॥ सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई॥ ३ ॥
अर्थ
राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह—इनके वश स्वप्न में भी मत होना। सब प्रकार के विकारों का त्याग कर मन, वचन और कर्म से श्रीसीतारामजी की सेवा करना।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ७५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण को सुमित्रा की राम-सीता सेवा हेतु प्रेरणा और आशीर्वाद का वर्णन है।
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श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद