गुर पितु मातु बंधु सुर साईं
गुर पितु मातु बंधु सुर साईं
चौपाई ३, दोहा ७४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
गुर पितु मातु बंधु सुर साईं। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं॥ रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही के॥ ३ ॥
अर्थ
गुरु, पिता, माता, बंधु, देवता और स्वामी, इन सब की सेवा प्राण के समान करनी चाहिए। श्रीरामजी प्राणप्रिय, जीवन के जीवन और सभी के स्वार्थ रहित सखा हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ७४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण को सुमित्रा की राम-सीता सेवा हेतु प्रेरणा और आशीर्वाद का वर्णन है।
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श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद