पावन पाथ पुन्यथल राखा
पावन पाथ पुन्यथल राखा
चौपाई २, दोहा ३१० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा॥ तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू॥ २ ॥
अर्थ
और उस पवित्र जल को उस पुण्यस्थल में रख दिया। तब अत्रि ऋषि ने प्रेम से आनन्दित होकर ऐसा कहा-हे तात! यह अनादि सिद्धस्थल है। कालक्रम से यह लोप हो गया था इसलिये किसी को इसका पता नहीं था।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का तीर्थ जल स्थापन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३१० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी द्वारा तीर्थ जल स्थापन और चित्रकूट के पवित्र स्थलों का दर्शन का वर्णन है।
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भरत का तीर्थ जल स्थापन