देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा

चौपाई ४, दोहा ३१२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा॥ फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई॥ ४ ॥

अर्थ

भरतजी के स्वभाव, प्रेम और सुन्दर सेवाभाव को देखकर वनदेवता आनन्दित होकर आशीर्वाद देते हैं। यों घूम-फिरकर ढाई पहर दिन बीतने पर लौट पड़ते हैं और आकर प्रभु श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों का दर्शन करते हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का तीर्थ जल स्थापन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३१२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी द्वारा तीर्थ जल स्थापन और चित्रकूट के पवित्र स्थलों का दर्शन का वर्णन है।

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भरत का तीर्थ जल स्थापन