एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं
एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं
चौपाई १, दोहा ३१२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं॥ पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा॥ १ ॥
अर्थ
इस प्रकार भरतजी वन में फिर रहे हैं। उनके नियम और प्रेम को देखकर मुनि भी सकुचा जाते हैं। पवित्र जल के स्थान (नदी, बावली, कुण्ड आदि), पृथ्वी के पृथक्-पृथक् भाग, पक्षी, पशु, वृक्ष, तृण, पर्वत, वन और बगीचे--
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का तीर्थ जल स्थापन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३१२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी द्वारा तीर्थ जल स्थापन और चित्रकूट के पवित्र स्थलों का दर्शन का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत का तीर्थ जल स्थापन