सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं

चौपाई ४, दोहा ३११ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं॥ मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी॥ ४ ॥

अर्थ

रास्ते में देवता फूल बरसाकर, बादल छाया करके, वृक्ष फूल-फलकर, तृण अपनी कोमलता से, मृग देखकर और पक्षी सुन्दर वाणी बोलकर--सभी भरतजी को श्रीरामचन्द्रजी के प्यारे जानकर उनकी सेवा करने लगे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत का तीर्थ जल स्थापन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी द्वारा तीर्थ जल स्थापन और चित्रकूट के पवित्र स्थलों का दर्शन का वर्णन है।

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भरत का तीर्थ जल स्थापन