रहा न नगर बसन घृत तेला

चौपाई ३, दोहा २५ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥ कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥ ३ ॥

अर्थ

[पूँछ के लपेटने में इतना कपड़ा और घी-तेल लगा कि] नगर में कपड़ा, घी और तेल नहीं रह गया। हनुमानजी ने ऐसा खेल किया कि पूँछ बढ़ गयी (लंबी हो गयी)। नगरवासी लोग तमाशा देखने आये। वे हनुमानजी को पैर से मारते हैं और उनकी बहुत हँसी करते हैं।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “लंका दहन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा पूँछ की अग्नि से समस्त लंका दहन का वर्णन है।

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लंका दहन