तामस तनु कछु साधन नाहीं
तामस तनु कछु साधन नाहीं
चौपाई २, दोहा ७ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥ अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥ २ ॥
अर्थ
मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होने से साधन तो कुछ बनता नहीं और न मन में श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों में प्रेम ही है। परन्तु हे हनुमान्! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामजी की मुझ पर कृपा है; क्योंकि हरि की कृपा के बिना संत नहीं मिलते।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “हनुमान-विभीषण संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लंका में हनुमानजी और विभीषण की भेंट तथा राम-भक्ति से पूर्ण संवाद का वर्णन है।
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हनुमान-विभीषण संवाद