कहहु कवन मैं परम कुलीना
कहहु कवन मैं परम कुलीना
चौपाई ४, दोहा ७ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥ प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥ ४ ॥
अर्थ
भला कहिए, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? [जाति का] चंचल वानर हूँ और सब प्रकार से हीन हूँ। प्रातःकाल जो हमारे नाम ले ले, तो उस दिन उसे भोजन न मिले।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “हनुमान-विभीषण संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लंका में हनुमानजी और विभीषण की भेंट तथा राम-भक्ति से पूर्ण संवाद का वर्णन है।
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हनुमान-विभीषण संवाद