जानतहूँ अस स्वामि बिसारी
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी
चौपाई १, दोहा ८ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥ एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥ १ ॥
अर्थ
जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी (श्रीरघुनाथजी) को भुलाकर [विषयों के पीछे] भटकते फिरते हैं, वे दुखी क्यों न हों? इस प्रकार श्रीरामजी के गुणसमूहों को कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय (परम) शान्ति प्राप्त की।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “हनुमान-विभीषण संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लंका में हनुमानजी और विभीषण की भेंट तथा राम-भक्ति से पूर्ण संवाद का वर्णन है।
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हनुमान-विभीषण संवाद