चंद्रहास हरु मम परितापं
चंद्रहास हरु मम परितापं
चौपाई ३, दोहा १० के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥ सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥ ३ ॥
अर्थ
सीताजी कहती हैं— हे चन्द्रहास (तलवार)! श्रीरघुनाथजी के विरह की अग्नि से उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलन को तू हर ले। हे तलवार! तू शीतल, तीक्ष्ण और श्रेष्ठ धारा बहाती है (अर्थात् तेरी धारा ठंढी और तेज है), तू मेरे दुःख के बोझ को हर ले।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “हनुमान का सीता दर्शन, रावण का धमकाना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अशोकवाटिका में हनुमान का सीता-दर्शन और रावण द्वारा साम-दाम-भय से सीताजी को विचलित करने के प्रयास का वर्णन है।
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हनुमान का सीता दर्शन, रावण का धमकाना