सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ
सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ
चौपाई २, दोहा ६१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ॥ मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता॥ २ ॥
अर्थ
आप मुझे कभी दुःखी देखकर सह नहीं सकते थे। भाई! आपका स्वभाव सदा कोमल रहा है। मेरे हित के लिए तुमने माता-पिता को छोड़ दिया और वन में जाड़ा, धूप, गरमी और हवा सब सहा।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “राम का विलाप, लक्ष्मण का उठना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ६१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राम के करुण विलाप, हनुमान के लौटने और लक्ष्मण के पुनर्जीवित होने का वर्णन है।
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राम का विलाप, लक्ष्मण का उठना